kaleemarth

कोलकाता ड़ूब रहा है, बचा लो: Save the Kolkata.

बंगाल का चुनाव

Kolkata ही नहीं पुरे बंगाल में चुनावी मौसम है, चारों तरफ रैलियां ही रैलियां, कहीं देश के प्रधानमंत्री तो कहीं पे राज्य की मुख्यमंत्री जनता को लुभाने की कोशिश कर रहे है, सियासी पार्टियों ने कोरोना संक्रमण की प्रवाह न करते हुए अपना खज़ाना खोल रखा है. बेतहाशा पैसा लुटाया जा रहा है. कोरोना संक्रमण को लेके स्कूल, कॉलेज बंद है लेकिन चुनाव जैसे पहले होता था उससे भी ठाट व बाट से हो रहा है. मुद्दे भी समझ से परे हैं, रसायन विज्ञान की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मुद्दे हैं क्या?

चाये के ढाबे पे बैठ के पता चला कि मुद्दे कुछ इस तरह हैं बंगाल के चुनाव में:

  1. तुम चोर
  2. नहीं तुम चोर
  3. हिन्दू, मुस्लिम
  4. फलां पागल
  5. नहीं फलां पागल

वैसे तो कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन मुझे चुनाव से कोई मतलब नहीं क्यों की मैं इसे जनता की बेवकूफी और मुख्य मुद्दों से भटकवाने का एक टूल मानता हूँ.

राजनीति का माहौल बन गया, चलिए अब आते हैं मुद्दे पर, बंगाल के लोगों ‘कोलकाता’ को बचा लो, तुम तो पढ़े लिखे हो, समझदार हो, बचा लो कोलकाता’ को नहीं तो बहुत देर हो जाएगी.

सवाल है कि कोलकाता को किससे बचाना है? ममता से, मोदी से, राहुल से?

हाँ, इनसे ही बचाओ कोलकाता को डूबने से, इन नेताओं से कहो कि बहुत जल्द कोलकाता डूब जाएगा, बस कुछ दिनों बाद या कुछ महीनों या कुछ सालों बाद.


कोलकाता क्यों डूब रहा है?

कोलकाता (Kolkata) समेत भारत के और भी शहर हैं जो डूब सकते हैं जैसे मुंबई, चेन्नई, कोलकाता. इन जैसे शहरों में करोड़ों लोग रहते हैं जो कि डूब रहे हैं, या वो कुछ समय बाद हमारे सामने ही इस दुनिया से मिट जाएंगे. हम बहुत बड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं. आखिर कारण क्या है?

कारण 1: हम जो कार्बन डाइ ऑक्साइड पैदा कर रहे हैं उससे गर्मी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन से बीते 25 सालों में महासागरों ने जितनी गर्मी सही है उसका अनुमान लगाना मुश्किल है, बस ऐसे समझ लीजिये कि ये गर्मी 3.6 अरब परमाणु बमों से उत्सर्जित गर्मी के बराबर है. इस गर्मी से बर्फ़ पिघली है, समुद्र का जल स्तर बढ़ता ही जा रहा है. मौसम की मार भी बढ़ती ही जा रही है. पहले तूफ़ान और बाढ़ साल में एकाध बार आते थे. बीते दशकों में तटीय इलाकों में हर पल तूफ़ान और सुनामी का डर बना रहता है. जलवायु परिवर्तन पर इंटरगवर्नमेंटल पैनल (IPCC) ने हाल ही में जारी की विशेष रिपोर्ट में कहा है कि कोलकाता निकट भविष्य में बढ़ती गर्मी की लहरों को देख सकती है, ये पैटर्न शेष भारत में भी दोहराया जा सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि “2 °C तक का टेम्परेचर बढ़ेगा, जिससे गर्म लहरों का थपेड़ा हम सभी आने वाले दिनों में महसूस करेंगे.

कारण 2: जलवायु परिवर्तन आधा सच है, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में इससे भी बड़ी समस्या जमीन है जोकि डूबती जा रही है. सूखी जमीन और बढ़ते जलस्तर के कारण तटीय इलाकों में रहना मुश्किल हो गया है. कोलकाता के आसपास नदियों का रास्ता बदलने और मुलायम जमीन पर शहर बसाने से हम ऐसी स्थिति में आ चुके हैं. कोलकाता नीचे से धंस रहा है, कारण है शहर के कुछ हिस्सों से भूजल का बेतहाशा इस्तेमाल. कोलकाता में जरूरत का एक चौथाई पानी जमीन से आता है. पिछले दशकों से जिस रफ़्तार से ज़मीन से पानी निकाला जा रहा है उससे भूजल का स्तर दिन बा दिन गिरता जा रहा है. अगर हमने घटते जलस्तर पर ध्यान ना दिया तो उसका दुष्परिणाम आने वाले दिनों में खतरनाक होगा. हो सकता है कि आने वाली पीढ़ी कोलकाता देख ही ना पाए.

बहुत से संगठनों ने इसके लिए आवाज़ उठाई मगर स्थिति जस की तस (चित्र: Down To Earth)

हालाँकि शहर के कुछ हिस्सों में घरों में पड़ रही दरारें और मेट्रो स्थल पे स्खलन इस बात जा सुबूत है, ये आपको कम लगता हो मगर सच्चाई ये है कि ये बर्बादी के पहले की सचेत करने वाले कुछ घटनाएँ हैं. दरारें, स्खलन, बार बार बाढ़ और तूफ़ान का आना बड़े संकट में तब्दील हो सकता है. जलवायु परिवर्तन निदेशालय ने जो बाढ़ आने की संख्या बताई थी वो अब तीन गुना होने की आशंका है. अब आप कुछ भी कर लें लेकिन कोलकाता की ज़मीन पहले जैसी नहीं हो सकती.

2008 में प्रकाशित एक किताब ‘प्राकृतिक आपदाएं’ में शिवगोपाल मिश्र लिखते हैं कि

“धीरे धीरे ऐसी ही दशा वर्तमान कोलकाता नगरी की होने वाली है, अपने अस्तित्व के 250 वर्षों के भीतर ही इसका तल आसपास के क्षेत्र से लगभग दो से चार फिट नीचे हो चुका है, और नगर की नालियां अपनी गंदगी के आसपास के नदी जल प्रवाह में बिना पंप किए विसर्जित नहीं कर सकती. कोलकाता नगरी के जल निकास (अपवाह) की समस्या जनता के समक्ष दीर्घकाल से है, किंतु इसका संतोषजनक समाधान नहीं मिल पाया कोलकाता का मामला भी इस विश्वास की पुष्टि करता है कि डेल्टाइ क्षेत्रों में नगरों के तल में धंसने की प्रवृत्ति है, जबकि आसपास का क्षेत्र धीरे धीरे ऊपर उठता है, परिणाम यह होता है कि नगर का मल जल नालियों से होकर तब तक नहीं बह पाता जब तक कृतिम में विद्या नहीं अपनाई जाती है, और नगर धीरे धीरे अस्वास्थ्यकर बन जाता है. निकट भविष्य में कोलकाता अपने ही मल जल में दफन हो सकता है”


क्या डरने की ज़रूरत है?

जी हाँ बिलकुल, अगर आप थोड़ा भी इस विषय से परिचित हैं. शहरों के डूबने का दो करण हैं.

  1. कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन और उससे से पैदा हो रही गर्मी ग्लासिअर को पिघला रही हैं जिसके कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है.
  2. आप जहाँ खड़े हैं उसके नीचे जमीन है, ज़मीन के अन्दर पानी भी है और हवा भी. लोगों ने अपने इस्तेमाल के लिए अगणित भू जल निकाला. जिससे ज़मीन में पानी की कमी हो रही है, कम पानी का मतलब है कि वो दबाव भी कम होगा जो जमीन को ऊपर की तरफ धकेलता है, इसलिए जमीन दब रही है और शहर डूब रहे हैं.

ऊपर बताए गए इन दो कारणों से एशिया के चार बड़े शहर हर साल नीचे धंसते जा रहे हैं शायद अभी ज्यादा असर न दिखे लेकिन जल्द ही दिखेगा. इसकी जीती जगती मिसाल एक शोध है. एक शोध रिपोर्ट के अनुसार बीते 100 सालों में बैंकॉक एक मीटर से ज्यादा डूब गया है, शंघाई दो मीटर से ज्यादा और इटली का पोतेंज़ा तीन मीटर से ज्यादा और टोक्यो चार मीटर से ज्यादा सागर में समा चुका है. सबसे बुरा हाल है इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता का है, जो आने वाले 25 से 35 वर्षों में शहर का लगभग पूरा तटीय इलाका जलमग्न हो जाएगा. उसके बाद अगला नंबर है कोलकाता का, अगर आप अभी सचेत नहीं हुए तो ये शहर नक्शे से गायब हो सकता है.


तो फिर क्या करें?

हालात बहुत ही बहुत ख़राब हो सकते हैं, इससे हम दो तरीकों से बच सकते हैं.

  1. राजनीतिक तरीका:
  • इनको, उनको कहते रहिये
  • कुछ नहीं, चुनाव प्रचार करिए और जो पैसा बचे उसका खर्च जलवायु के संरक्षण में लगा दीजिये. (ये उनके लिए जो इस आफत को समझ नहीं सकते).
  • जनता को इस मुद्दे से भटका के डर को खत्म करने का ढोंग करिए.
  1. तकनीकी तरीका:
  • तटीय शहरों में आस पास उचित दीवार खड़ी कर दी जाए तो उन्हें कुछ हद तक बचाया जा सकता है.
  • भू जल के इस्तेमाल पर तत्काल पाबंदी
  • शहर में नए घरों के बनने पे पाबंदी लगा दी जाए
  • शहर प्लास्टिक कचरा और मल जल को कृतिम विधियों से दुसरे शहर में decompose किया जाए, समुद्र में न डालें.
  • कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने के लिए वैज्ञानिकों की सलाह को स्वीकार करें
  • सूखे जलस्रोतों को रिचार्ज करें
  • जल का स्टोर करें
  • पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति लोगों को जागरूक करें, नेताओं को पहले जागरूक करें.

Sources:

  1. DW YouTube
  2. शिवगोपाल मिश्र

ये भी पढ़े….

  1. मीट खाने के मामले में भारत से सीखिए
  2. आजकल के सामाजिक मुद्दे
  3. जहाँ लड़का देख के होता है दहेज़ का रेट फिक्स

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *