मीट खाने के मामले में दुनिया को भारत से सीखना चाहिए. Less meat consumption could help to save the environment

भारत में साल में प्रति व्यक्ति मीट की खपत (meat consumption) है तीन किलोग्राम. रूस में एक आदमी और औसतन साल में 76 किलोग्राम मीट खाता है. जर्मनी में ये आंकड़ा 87 किलो ग्राम के आसपास है. वहीं अमेरिका में प्रति व्यक्ति मीट की खपत (meat consumption) है 127 किलोग्राम प्रतिवर्ष. यह आंकड़ा साफ़ करते हैं कि पश्चिमी देशों में मीट ही खाने का मुख्य आधार है.

भारत दुनिया का उन देशों में शामिल है जहाँ सबसे कम मीट खाया जाता है और ये बहुत अच्छी बात है क्योंकि आज जिस नाजुक पड़ाव पर हम आ पहुंचे हैं वहाँ दुनिया को भारत से सीखने की जरूरत है की शाकाहारी खाने को अपनाकर हम अपने पृथ्वी और अपने पर्यावरण को बचा सकते हैं. वैसे दुनिया भर में मीट खाने को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. जैसे जैसे दुनिया की आबादी और आर्थिक  विकास बढ़ता गया दुनिया में मीट की मांग (meat consumption) भी बढ़ती गई.

                                      चित्र: प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष मीट की खपत (meat consumption) 

1960 में दुनिया की आबादी थी लगभग तीन अरब. उस वक्त मीट की सालाना खपत थी 7,00,00,000 मीट्रिक टन. इस हिसाब से प्रतिव्यक्ति सालाना 23 किलोग्राम मीट का औसत था. 2018 आते आते दुनिया की आबादी हो गई 7.6 अरब और मीट की खपत (meat consumption) हो गई सालाना 35,00,00,000 मीट्रिक टन. इस हिसाब से प्रति व्यक्ति प्रति साल 46 किलोग्राम का औसत बैठता है मीट की जितनी मांग बढ़ेगी उतनी ही ज़्यादा मवेशियों की जरूरत होगी और मवेशियों को पालने के लिए बहुत सारी जमीन चाहिए. Germany पर्यावरण एजेंसी का कहना है कि दुनिया में खेती के लायक जितनी भी ज़मीन है उसका 71% हिस्सा मवेशियों के चारा उगाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं खाद्य उत्पादन के लिए 18 फीसदी जमीन इस्तेमाल की जाती है. 7% जमीन पर कॉटन जैसा कच्चा माल देने वाली फसलें उगाई जाती है और 4% जमीन पर बायोगैस बनाने के लिए मक्का जैसी एनर्जी क्रॉप (Energy Crops) की खेती हो रही है.

चूँकि मीट की मांग बढ़ रही है तो कृषि योग्य जमीन पर भी दबाव बढ़ रहा है ऐसे में ब्राज़ील जैसे देशों में बड़े बड़े वनों को साफ किया जा रहा है ताकि जानवरों के लिए चारा उगाया जा सके. जंगल काटे जाने से बहुत सारे वन्यजीवों से के बसेरे खत्म हो रहे हैं और वो फिर इंसानी बस्तियों का रुख करने लगते हैं इससे जानवरों और इंसानों का टकराव बढ़ता है साथ ही इंसानों की सेहत के लिए भी कई तरह के खतरे पैदा होते हैं जैसे कि जानवरों में पाए जाने वाले वायरस इंसानों को लग सकते हैं और कई बार इससे हमारी भी फैल सकती है. कोरोना वायरस (nCovid-19) भी तो इंसानों को जानवरों से ही मिला है.

ऐसे में दुनिया की आबादी का पेट भरना और पृथ्वी के जंगलों को भी बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है. जानकार ऐसी डाइट अपनाने की सलाह देते हैं जिसमें मीट कम हो और पेड़ पौधों से मिलने वाला भोजन ज्यादा हो. यानी हमारे खाने में फल साग सब्जियों अनाज और दालें ज्यादा होनी चाहिए. वैसे सोचने वाली बात ये भी है कि जिन खाने को उगाने में इतने प्राकृतिक संसाधन और इतनी मेहनत की जरूरत होती है उसका भी पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं होता है. दुनिया में पैदा होने वाले कुल खाने का एक तिहाई हिस्सा कूड़े के ढेर में जाता है.

एक किलो बीफ तैयार करने के लिए 15,000 लीटर पानी खर्च होता है एक किलो मटन के लिए  10,400 लीटर और चिकन पर 4325 लीटर तक की खपत होती है.

दूसरी तरफ एक किलो ब्रेड यानी डबलरोटी के उत्पादन पर 1608 लीटर से पानी से काम चल जाता है. बात एक किलो चावल के उत्पादन की करें तो उस पर 2500 लीटर पानी की खपत हो जाती है.

जब व्यापक पैमाने पर करोड़ों टन बीफ का उत्पादन करने का हो तो आप समझ सकते हैं कि कितने पानी की जरूरत होगी. ये पानी हमारी नदियों झीलों और जमीन के नीचे से स्रोतों से ही प्राप्त किया जाता है. अकेले जर्मनी में 2019 में 76.3 करोड़ जानवरों को मारा गया जबकि देश की आबादी सिर्फ 8 करोड़. दुनिया भर में 1 साल के भीतर मीट के लिए मारे जाने वाले जानवरों का आंकड़ा देखें तो ये 70 अरब से भी ज्यादा है. इनमें से ज्यादातर जानवर औद्योगिक देशों में काटे जाते हैं खासकर बड़े पैमाने पर बूचड़खानों में.

दुनिया भर में जितने मीट की सप्लाई होती है उसमें से एक तिहाई का उत्पादन अकेले चीन में होता है. भारत के अलावा मीट की सबसे कम खपत अफ्रीकी महाद्वीप में होती है. जहाँ यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति प्रति साल 17 किलोग्राम है. वहीं अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में प्रति व्यक्ति प्रति साल खपत 100 किलोग्राम से ज्यादा है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में इंसानों के लिए जिस तरह से खाने का उत्पादन हो रहा है उसके वजह से 24,000 से लेकर 28,000 पौधों और जीवों के अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है.

इसका मतलब साफ है कि हमें अपने खाने और खाने से जुड़ी पसंद में बदलाव करने की जरूरत है. यानी मीट की खपत (meat consumption) को कम करना होगा और शाकाहार की तरफ जाना होगा, और भारत में तो इतने तरह का शाकाहारी खाना मौजूद है कि बस खाते ही रहिये.


Source:

उपरोक्त लेख DW YouTube चैनल से लिया गया है. https://www.youtube.com/watch?v=EgDMa4s0jQY


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